Sunday, December 20, 2009

दाराशिकोह की मौत


दाराशिकोह की मौत
कहानी

महाराजकृष्ण संतोषी

दरवाज़ा खुला और भीतर एक दढ़ियल सा आदमी दाखिल हुआ। उस समय मैं अपने लिखे हुए कुछ ज़रूरी नोट्स देख रहा था। दरअसल मैं एक ऐतिहासिक नाटक लिखने की कोशिश में था और विभिन्न इतिहास ग्रन्थों से लिए कुछ नोटस आपस में मिला रहा था। मैने उस आदमी को गौर से देखा। ऐसा लगा जैसे वह इतिहास का कोई पात्र हो वेशभूषा और कदकाठी से वह आज का आदमी लग ही नहीं रहा था। ’’क्षमा करना मैंने आपको पहचाना नहीं‘‘ सभ्य लहज़ में कहा मैनें। ’’कैसे पहचानोगे कभी मैं इस मुल्क का बादशाह हुआ करता था।‘‘’’बादशाह!‘‘ मैंने हैरत के साथ पूछा।’’हां बादशाह...‘‘मुझे शक हुआ कि यह आदमी किसी नाटक कंपनी से भागा हुआ कलाकार है जो पगला गया है।’’ आप कहां से पधारे हैं ‘‘ मैंने यंू ही कहा।’’आगरा से।‘‘ यह सुनते ही मेरा शक विश्वास में बदल गया। सच मुच यह कलाकार बावरा हो गया है। अन्यथा वह खुद को हिंदुस्तान का बादशाह नही कहता।’’ आप का नाम क्या है, जहांपनाह!‘‘ मेरे स्वर में व्यंग्य था। ’’औरंगज़ेब!...‘‘ मैने जैसे कुछ सुना ही नहीं। उस ने दुबारा कहा-’’ओरंगज़ेब!‘‘मैं भी मसखरी के मूड़ में आ गया था।’’जहांपनाह! आप तो कब के मर चुके हो...‘‘’’हां!‘‘’’फिर किस वजह से अपनी कब्र से बाहर निकल आए हैं‘‘’’कई दिनों से तुमने मेरे सकून की नीद में खलल डाला है...‘‘’’वह केसे सुल्तान‘‘ इस बार मैं कुछ संजीदा हो गया था। ’’क्या यह सच नहीं कि तुम मेरे भाई दाराशिकोह पर नाटक लिख रहे हो‘‘उसने ऐसे पूछा जेसे किसी अपराधी से पूछा जाता है।’’हां, यह सच है!‘‘ मैंने जवाब दिया।’’पर मेरे होते हुए तुम दाराशिकोह पर नाटक कैसे लिख सकते हो‘‘’’क्यों नहीं लिख सकता‘‘ मेरे स्वर में विरोध था।’’क्योंकि वह सिरफिरा था...बहकी बहकी बातें किया करता था और काफिरों की किताबे पढ़ता रहता था।‘‘ मैंने देखा औरंगज़ेब की आंखों से चिंगारियां निकल रही थीं। पर मैं भी निर्भय था। मैंने भी एक लेखक की तरह तर्क किया।’’वह सिरफिरा नहीं बहुत बड़ा आलिम था।‘‘’’नहीं वह काफिर था।‘‘’’नहीं वह सूफी था।‘‘’’नहीं वह दीन का दुश्मन था।‘‘’’नहीं वह सच्चा इंसान दोस्त था।‘‘ कुछ लम्हें यंू ही बीत गए। ऐसा लगा औरंगज़ेब कुछ बड़बड़ा रहा है। पर मैं कुछ और सूनने के मूड़ में नहीं था। जाने से पहले वह यह धमकी देना नहीं भूला कि अगर मैंने दाराशिकोह पर नाटक लिखा तो अच्छा नहीं होगा।कई दिनों बाद का किस्सा है। रात का समय था। दरवाज़े पर दस्तक हुई और जब मैने दरवाज़ा खोला तो सामने कोई दरवेश सा आदमी खड़ा था जो बेहद डरा डरा सा लग रहा था।’’क्या चाहिए‘‘ मैने पूछा।’’पनाह‘‘ वह बोला।’’हम अजनबियों को पनाह नहीं देते... क्या पता वह कोई...।‘‘उसने मुझे वाक्य पूरा नहीं करने दिया।’’मैं ऐसा नहीं हंू...‘‘ उसने कहा।’’क्या भरोसा‘‘’’सच कहता हंू मैं ऐसा नहीं हंू। . . कुछ रुककर ़ ़ ़ मैं दाराशिकोह हंू...‘‘’’दाराशिकोह... वह मुगल सल्तनत का राजकुमार...‘‘ मेरा मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया... खुशी से भरी एक चीख निकलते निकलते मेरे गले में अटक सी गई।कैसा संयोग था... मेरे नाटक का नायक मेरे सामने खड़ा था। न कोई राजसी ठाठ, न आंखों में गरूर, साधारण सी वेशभूषा के बावजूद कितना सौम्य कितना आकर्षक।खाना खाने के बाद मेरी दाराशिकोह से खूब बातें होने लगीं। सचमुच वह ज्ञान का विलक्षण भंडार था परंतु गर्व का लेश भी नहीं। बातों ही बातों में उसने मुझे बताया कि औरंगज़ेब ने उसें यह धमकी दी है कि अगर वह किसी नाटक का नायक बना तो अच्छा नहीं होगा। मुझे जो धमकी औरंगज़ेब से मिली थी, दाराशिकोह को शायद उसकी जानकारी नहीं थी।सुबह मेरे जागने से पहले ही दाराशिकोह जाग गया था। मैंने देखा वह आंख बंद किए प्रार्थना की मुद्रा में कुछ बुदबुदा रहा था। उसे प्रार्थना करते हुए देखकर मुझे लगा यह शख्स तो कुछ अलग ही दिख रहा है। यह न तो हिंदू जैसा दिख रहा है, न मुसलमान जैसा। यह तो सिर्फ एक आम इंसान सा दिख रहा है...जिसकी प्रार्थना का कोई धर्म नहीं होता। जब मैं नहा धोकर बैठक में वापस आया तो तो देखा वह अपनी डायरी में कुछ लिख रहे था। मैंने पूछना मुनासिब नहीं समझा। पर उसने खुद ही बताया कि वह एक अघूरी नज्म पूरी कर रहा था। फिर खुद ही कहा ’सुनाऊं‘. . . पर शायद यह सोच कर कि मुझे फारसी नहीं आती, वह चुप रहा।अचानक उसने पूछा’’अब क्या सोचा है आपने‘‘’’किस बारे में‘‘ मैंने जानना चाहा।’’क्या अब भी मुझ पर नाटक लिखोगे‘‘यह सुनकर मैं गंभीर हो गया। कुछ नहीें बोला।उसने फिर पूछा और मैंने जब ’’हां!‘‘ कहा तो वह चैंक गया! कहा, ’’पर औरंगज़ेब!‘‘’’औरंगज़ेब को हिंदी पढ़ना कहां आता है।‘‘ यह सुनकर दाराशिकोह के होंटों पर एक हल्की सी मुस्कान की रेखा नमूदार हुई।दाराशिकोह लौट गया था। कहां ? कुछ पता नहीं! क्या पता हिंदुस्तान में दाराशिकोह के लिए कोई जगह बची ही न हो. . . पर आसपास की हवा उसकी उपस्थिति की गवाही दे रही थी।यह कोई दुस्वप्न चल रहा था, या इतिहास ने मेरे सामने एक चुनौती रख दी थी। मैं सोचता जा रहा था और साथ ही साथ डर भी रहा था। मैंने अपने सारे नोट्स दुबारा पढ़े ओर नाटक लिखने की मानसिक तैयारी करने लगा।इस बीच एक विचित्र घटना घटी। दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने जब द्वार खोला तो सामने पुलिस के दो सिपाही खड़े थे। ’’क्या बात है?‘‘ मैंने पूछा।’’आपको हमारे साथ थाने चलना होगा।‘‘-उनमें से एक सिपाही बोला।’’किसलिए?‘‘’’आपको एक लाश की शिनाख्त करनी है।‘‘यह सुनकर मैं बेहद डर गया। कहीं कुछ अशुभ ज़रूर घटा है। सोचने का समय नहीं था। सड़क पर पुलिस की जीप प्रतीक्षा कर रही थी। थाने पहंुचकर मुझे बताया गया कि जो लाश मिली है उसके पास से एक डायरी बरामद हुई है, जिस पर मेरा नाम और पता लिखा हुआ है। मैं भीतर ही भीतर कांपने लगा। कहीं कोई पुराना वैर तो नहीं निकाल रहा। पर मैं तो अदना सा लेखक हंू जिसकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। कहीं पुलिस कोई षड़यंत्र तो नहीं रच रही थीं। यह लोग किसी और को बचाने के लिए. . तो नहीं फंसाना चाहते मुझे! ’’क्या मैं लाश देख सकता हंू?‘‘ साहस बटोर कर मैंने इंस्पेक्टर से कहा।’’हां...हां ...कयों नहीं...।‘‘ वापस जवाब मिला।हम एक बेहद ठंडे कमरे में गए, जहां, लाशे ही लाशे दिखाई दे रही थीं। जब वह लाश मुझे दिखायी गई तो मैं डर गया। मेरे मुंह से अकस्मात निकला ’’हे राम!‘‘यह किसी दरवेशनुमा आदमी की बुरी तरह से घायल और लहूलुहान लाश थी, जो पहचान में नहीं आ रही थी।’’क्या आप इसे पहचानते हैं?‘‘’’नहीं!‘‘ मैंने विश्वास के साथ कहा’’पर इसकी डायरी में आपका नाम पता लिखा है?‘‘ वह वर्दीपोश अंदाज़ में बोला।मुझे उलझाने के लिए उन्होंने कई और सवाल पूछे पर सफल नहीं हुए। अंततः कुछ समय थाने में बेमतलब बिठाए रखने के बाद शायद निर्दोष जानकर मुझे घर जाने दिया गया।अगले दिन सुबह जब मैं अखबार पढ़ रहा था तो एक छोटी सी खबर ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। लिखा था-’कल पुलिस को शहर में एक पार्क के पास एक लाश मिली। उसके बैग से कुछ किताबें और एक डायरी बरामद हुई है। इस आदमी का नाम दाराशिकोह बताया गया था। खबर पढ़ कर मैं सन्नाटे में आ गया। मेरे नाटक का नायक और मैंने ही नहीं पहचाना! पहचानता भी कैसे उसकी सारी देह लहूलुहान थी।सब कुछ भूल कर मैं नाटक लिखने में व्यस्त हो गया। समय बीत रहा था। और अचानक, एक दिन जब मैं लिखने में व्यस्त था, मेरे नाटक के पन्नों से औरंगजेब बाहर निकल आया। वह जोर जोर से हंस रहा था। उसे इस तरह हंसते देख मैं डर गया। ऐसा लगने लगा कहीं हंसते हंसते ही वह मेरा कतल न कर दे। मृत्यु की कल्पना से मैं दहल गया। उधर वह भी मेरे डर को भांप कर बोला-’’बता तो ज़रा कौन है तेरे नाटक का नायक?‘‘मैं चुप रहा। मुझसे कुछ बोला नहीं जा रहा था।’’क्या बोलोगे नहीं?’’ उसके स्वर में सत्ता का मद था। मैंने आंखें नीची कर लीं। लगा जैसे मैं अपनी अंतिम सांस ले रहा हंू।मेज़ पर मेरे नाटक की पांडुलिपी फड़फड़ा रही थी। मैंने देखा औरंगज़ेब के भय से शब्द कांप रहे थे। अब मैं क्या करूं? एक तरफ जीवन था, जीवन का मोह था, दूसरी तरफ आदर्श! किसका साथ दंू? कुछनहीं सूझ रहा था। समय बीत रहा था और मैं अपनी कायरता से हार रहा था। अकस्मात मैंने अपने आप को यह कहते सुना-’’क्षमा करना जहांपनाह!‘‘अपने ही शब्दों पर मुझे विश्वास नहीं हो रहा था। सोचने लगा था कि क्या मैं वही हंू जो नाटक में बड़ी-बड़ी बातें कहता फिरता हंू ! क्या सचमुच सत्य के बल से इतना अधिक होता है सत्ता का बल? या हमारी कायरता हमारी दुश्मन होती है। उसी समय मेरे अंतकरणसे एक और आवाज गूंजी - ’’इतिहास में दाराशिकोह की एक ही मौत लिखी है पर दाराशिकोह बार बार मरता है। हर बार उसे कोई औरंगजेब नहीं हमारी कायरता मारती है !

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