Wednesday, December 23, 2009

उमस


महाराज कृष्ण संतोषी


महाशय
आप पूछ सकते हैं
जब उमस हो
तो तैमूर को
याद करने में क्या तुक

पहाड़ बर्फ नदियाँ
स्मृतियों में इनका आना
स्वाभाविक है
पर उमस में जाग जाना
इतिहास बोध
सचमुच हैरान कर देने वाला है

महाशय आप और कुछ न पूछें
सिर्फ़ सुनें

दरअसल
हमारे यहाँ जब बच्चों को
daant पड़ती थी
तो बुजुर्ग उनसे यह कहते थे
जा तुझे देखने पड़ें
उमस भरे दिन
इस daant में हमारे इतिहास का वह दस्तावेज़ है
जो हमारी ही सांसों में
खुलता बंद होता है

महाशय
आप विश्वास करें न करें
पर जब उमस badti है
समय बैचैनी से कटने लगता है
हमें अपना इतिहास याद आता है
सात सौ साल पहले
तैमूर के डर से
भाग आए थे
हमारी धरती पर सात सौ घुड़सवार
और उन डरे हुए
सात सौ घुड़सवारों के डर से
सात लाख इंसानी शक्लें
कब से भटकती फ़िर रही हैं
यहाँ वहां
पसीने स लथपथ

महाशय
आप जिसे उमस कहते हैं
हमारे लिए उसका सम्बन्ध
समंदर से नहीं
तैमूर के आतंक से है ...

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